समय

Sunday 14 August 2011

स्वतन्त्रता

अपनी इयत्ता की सतर्क पहचान,
अपने वज़ूद की अभिज्ञा,
तथता अपनी;
अपने चतुर्दिक के प्रति सहज अभिमुख भाव,
स्वतन्त्रता है!
स्वतन्त्रता अभिव्यक्ति है,
सम्प्रेषणीयता है, सम्भाल है,
मूल्यों की निजता,
सम्बन्धों का आकलन गहन,
मानुस-धर्म की गहरी समझ,
निर्वहण,
स्वतन्त्रता है!
जातियों, समाजों, राष्ट्रों के भाग्याकाश पर,
स्वतन्त्रता-सूर्य,
दुव्वर्रिवैरिवरवारणवाजिवारयाणयौधसंघटनघेरघटान्धकारकम्1 तले कराहता/अकुलाता रहा है प्रायशः!
गुलामी की घोर प्राचीरों में बन्दिनी चेतना
बहुत रोई है,
स्वतन्त्रता के बिना!
विश्व के सप्तद्वीपीय पौराणिक भूगोल में,
महत् है जम्बुद्वीप,
जाम्बुनद किं वा तपाये सुवर्ण सी,
उर्वरा है रज, इस भूमि की,
इसके भरतखण्डस्थ भारतवर्ष में
मानवीयता, वैभव, सद् रहे हैं-सुप्रतिष्ठित!
यहां पैदा हुए मनुष्य, अग्रजन्मा/अग्रज हैं,
अपने आचरण से विश्व को करते हैं-सुशिक्षित!
-एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः,
स्वं स्वं चरित्रम् शिक्षरेन् पृथिव्याः सर्व मानवाः।2
-यह विभुता प्रलुब्ध करती रही है,
आततायी हमलावरों/लुब्धकों को,
सदियों से उनके निशाने पर रही है,
भारत-भारती-स्वतन्त्रता!
यहां के आदिवासी जनों/ शिड्यूल ट्राइब्ज़् को,
द्राविडों/पणियों किं वा फिनीशियनों ने,
स्यात् सबसे पहले किया था-वशीकृत!
भोली निरीह बस्तियों की मुस्कान छिनी,
आशियाने उजड़े,
सिन्ध-नर्मदा-गंगा-गोदावरी तक,
ब्राहुई संवर्ग3 भाषा, द्राविड संस्कृति हुई अधिकृत!
गोष्ठ-गांव उजड़े,
नागर-व्यापार बहुल पूंजी-प्रगल्भ
पंचनद (पंजाब) प्रान्तर में विजयिनी
सैन्धव संस्कृति फैली!
सुष्ठु नगर, शहरी चाकचिक्य, समृद्धि-प्रभव-संस्कृति की,
यह भूमि पहली बार थी गवाह बनी!
अभी कुल जमा दो सौ साल पहले,
पेरिस का सीवेज़् सिस्टम वैसा न था,
जैसा हड़प्पीय शहरों का, ईसा पूर्व की तीसरी सहस्राब्दी में रहा!
चौड़ी सड़कें, तरण-ताल, हम्माम, ईंटों की सुच्ची जुड़ाई,
वास्तु का कौशल-कमाल,
शिव-गौरी कल्पना, योनि-लिंग-पूजा-प्रमाण,
आदर गो-वंश का, पूजित ककुद्मान वृष4
धान की खेती, अद्भुत तक्षण-शिल्प,
भारती को अर्पित कर, द्रविड जन थे प्रकृतिस्थ!
तभी स्यात् आर्यान/ईरान के पाठारों से,
गोरी काकेशियन क़ौम हुई अन्तःसंक्रमित,
शफ्फ़ाक़ दूध सी सफेदी चमड़ी की,
कंजी आँखें,
नाक सुतवा, उन्नत ललाट, मज़बूत कद-काठी,
घोड़े/लोहे के इस्तेमाल से सशक्त,
गंवार जाति वह, आर्य (श्रेष्ठ) थी कहलाती!
आर्यों की पुरन्दरी-वृत्ति5 ने द्राविड नागरों को
किया स्थान-स्खलित,
उजड़े शहर, विस्थापित हुआ जन,
विन्ध्य-सतपुड़ा के ओट छुपी, द्राविड-श्री!
भारत-भू पर स्वतन्त्रता भारती का यह,
दूसरा विलाप-पर्व रहा!
वोल्गा6 से गंगा तक,
अप्रतिरथ रहा आर्य-प्रभव!
कृत्स्न पृथिवी जय7 एकराट्यता-प्रत्यय,
आदन्ताद् पराद्ध्र पृथिव्यैः
समुद्रपर्यन्ताया एक राडति-मिति8
अपूर्व ऐष्वर्य, इतिहास का सुवर्ण-कल्प,
सद्, साहित्य, कला की सबकी
चरम परिमिति;
विश्व-गुरु हुआ भारत,
जयति, जय-जय भारती!
बदला इतिहास पट, खिलखिलायी नियति-नटी,
दज़ला-फ़रात के उर्वर अर्द्धचन्द्रीय9 दोआबे में,
सेमेटिक प्रजाति के अतीत-संस्कृति-तल्प पर,
उतरा पयम्बर10 एक,
अलख थी उसकी टेक,
मोमिन था, रसूल था, उसकी रहनुमाई थी!
अरबी प्रायद्वीप के दक्षिणी प्रत्यन्त पर
उठा जो बगूला प्रबल,
सत्ताएं चरमराईं!
तलवार-धार चढ़, मुस्लिम राजनयिकों ने
सिकन्दर से कई गुना, विश्व-भू-खण्ड जीते,
दुर्दम्य थे वे,
मनुष्यता थी थर्रायी!
सिन्ध-मुल्तान, भटिण्डा, गुजरात, दिल्ली, पटना, बंगाल
भू-लुण्ठित हुए सब!
ईस्वी बारह सौ पाँच,
भारती का थमा हास,
पाँच सौ बासठ साल,
मुल्क़ रहा उनका गुलाम,
सल्तनत उनकी रही, हमारी थी जग हंसाई!
फिर गोरी क़ौम एक कहलाती अंग्रेज
बनिज-विपण कर्म-कुशल, भारत-भू तक आयी,
बंगाल-अवध-दिल्ली अपदस्थ हुए,
हारे भारत-जन, प्लासी की वह लड़ाई।
ई. 1757 कम्पनी राज हुआ सुप्रतिष्ठ
भारत-भुवन में गुलामी की छाई स्याही!
ठीक सौ साल बाद विप्लव का बिगुल बजा,
वह प्रथम स्वातन्त्र्य-समर,
उसकी शहादत को नमन!
दमन का अलात चक्र11 कर गया जो हमें दग्ध,
विफल विप्लव हो गया, मात हमने खायी!
हिन्दुस्तानी क़ौम के अगले नब्बे साल,
तारीख़ के पन्ने हैं-सचमुच बेमिसाल,
औरतों-मर्दो-बुज़ुर्गों ने सपने देखे,
गुलामी का कहर टले,
हम सिर उठा के चलें!
कितने अफ़साने, कहानियां कितनी,
कितने अकूत द्वन्द्व, कितनी लड़ाई, कितनी हाथापाई?
शत्रु गढ़ ध्वस्त कर, हमने आज़ादी पायी!
ई. उन्नीस सौ सैतालीस,
पन्द्रह अगस्त का दिन!
फहरा तिरंगा-ध्वज, भारत-श्री मुस्काई!
अब हम स्वतन्त्र थे, निज जन के तंग में;
जय हे! जय हे! जय हे!
जय जय जय हे!

सन्दर्भ-

  1. मिहिरभोज प्रतीहार नरेश (ई. 836-885) की ग्वारियर प्रशस्ति (लेख) श्लोक सं0 10.
  2. मनुस्मृति
  3. वर्तमान दक्षिण भारतीय द्रविड भाषाएं, भाषा शास्त्रियों के मत में बाहुई परिवार की हैं। यह भाषा का ईसा पूर्व की शताब्दियों में वर्तमान बलूचिस्तान में भी व्यवहृत था।
  4. सिन्धु घाटी की मुहरों पर अंकित डील काला सांड़।
  5. इन्द्र आर्य (वैदिक) देव मण्डल का प्रमुख देवता है। विपक्षियों के पुरों (नगरों के) नाश (दलन) करने के नाते पुरन्दर उसका विशेषण है।
  6. रूस की प्रसिद्ध नदी।
  7. द्वितीय चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के सान्धि विग्रहीक आमात्य शाब बीरसेन का उदयगिरि लेख।
  8. ऐतरेय ब्राह्मण ग्रन्थ।
  9. इतिहासकार ब्रेस्टेड ने दज़ला-फ़रात नदी घाटी के उर्वर अर्द्धचन्द्र (फर्टाइल क्रीसेन्ट) कहा।
  10. पयाम (सन्देश) लाने वाला=पयम्बर=पैगम्बर।
  11. आग का बगूला।